एक इंटरव्यू में रविंद्र ने कहा, 'शुरुआत में ज्यादातर दुकानदारों ने मुझे मना कर दिया था क्योंकि उनके पास पहले से ही भरोसेमंद वेंडर थे। इसलिए मैंने खुद अपनी डिस्प्ले स्पेस को साफ और व्यवस्थित करना शुरू किया। मेरे इस छोटे से प्रयास ने उन्हें प्रभावित किया और आखिरकार वह मेरे सबसे बड़े समर्थक बन गए।' इस स्टार्टअप में सूरजमुखी, मटर, ब्रोकली, सरसों और चार प्रकार की मूली जैसी 10-15 लोकप्रिय वैरायटी उगाई जाती हैं। रविंद्र इसके लिए बेहद वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाते हैं। इसमें बीजों को हाइड्रोजन पेरोक्साइड से सैनिटाइज करने, 8 घंटे भिगोने, 4 दिन के ब्लैकआउट पीरियड में रखने और फिर 12 से 16 घंटे फुल-स्पेक्ट्रम ग्रो लाइट्स में रखने जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं। शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए कटाई से एक दिन पहले पानी देना बंद कर दिया जाता है। चूंकि माइक्रोग्रीन्स बेहद संवेदनशील और जल्दी खराब होने वाले होते हैं। इसलिए कंपनी सिर्फ बेंगलुरु में 5 किमी के दायरे में ही हाइपर-लोकल डिलीवरी करती है। ग्राहकों का भरोसा जीतने के लिए रविंद्र ने बकायदा डाइटीशियन्स और न्यूट्रिशनिस्ट्स के साथ पार्टनरशिप की है। यह उनके सब्सक्रिप्शन मॉडल वाले ग्राहकों को मुफ्त न्यूट्रिशन कंसल्टेशन प्रदान करते हैं।
यह है बिजनेस मॉडल
बिजनेस मॉडल की बात करें तो यह स्टार्टअप B2B (रिसॉर्ट्स) और B2C (200 से अधिक फिक्स्ड ग्राहक) दोनों मॉडल्स पर काम करता है। माइक्रोग्रीन्स की एक ट्रे या बॉक्स की कीमत 199 रुपये है। आज माइक्रोग्रीन्स की बिक्री से हर महीने 4 से 6 लाख रुपये की कमाई होती है। वहीं, रविंद्र की ओर से चलाए जाने वाले 12-हफ्तों के विशेष एग्रीप्रेन्योरशिप ट्रेनिंग प्रोग्राम से लगभग 2 लाख रुपये महीना अतिरिक्त आते हैं। इस तरह उनका सालाना रेवेन्यू 70 लाख रुपये तक पहुंच जाता है। खास बात यह है कि शहर से आने वाले बड़े ऑर्डर्स को वह खुद पूरा करने के बजाय उन्हीं किसानों को सौंप देते हैं जिन्हें उन्होंने खुद ट्रेनिंग दी है। भविष्य के लिए रविंद्र की योजना माइक्रोग्रीन्स को फ्रीज-ड्राई करके पाउडर फॉर्मेट में बदलने की है ताकि इसकी शेल्फ लाइफ बढ़ सके। साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसकी शुद्ध ऑर्गेनिक न्यूट्रिएंट्स के रूप में सप्लाई की जा सके।